Mar 20, 2017

🚩माँगो मत







ॐ शिव गोरख योगी 

मांगो मत ✖✖

मांगने से प्रार्थना गंदी हो जाती है 
प्रार्थना को मुक्त रहने दो "सोॐ''
मांग से मुक्त, 
तो ही प्रार्थना आकाश में उड़ पाती है
मांगने से प्रार्थना भारी हो जाती है
प्रार्थना आकाश तक नहीं उठ पाती

 मांगोगे भी तो क्या?

हमारा मन ही तो मांगेगा न! 
मन से मुक्त होना है। 
उसकी मांग की पूर्ति चाहोगे तो मन से मुक्त कैसे होओगे? 
मांग भी तो एक विचार है न? 
विचार के ही बाहर जाना है और विचार की ही पूर्ति मांगोगे, 
तो बाहर कैसे जाओगे? 
मांगो मत, 
मौन हो जाओ। 
बह जा सोम उसके चरणों में गंगाजल की तरह
धो दे उसके चरण अपने जीवन से, बस इतना काफी है। 
और फिर देख मिलता है बहुत
बिन मांगे मिलता है। 
अगर तुम्हारे भीतर प्रेम हो तो परमात्मा को मांग लेना

अगर ध्यान हो तो कुछ मांगना ही मत। 
ध्यान तो ऊंचे से ऊंचा शिखर है : 
कुछ मांगना ही मत"सोॐ'' 
चुप रह जाना—मौन,

 मिलेगा बहुत, 
पूरा परमात्मा बरस पड़ेगा तुम पर 
उसके आशीष ही आशीष फूलों की तरह तुम्हें लबालब भर देंगे 
जय गुरु धर्मनाथ आदेश आदेश 
अलख आदेश
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सोम---9555779119 



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🚩5 तत्व, 25 प्रकृति









प्रस्तुति :- #गुरु_नगर 0125

#तेरी_पाँच_तत्व_की_काया_जिसमे_ब्रह्म_ज्ञान_समाया

🥀जैसा हम सब जानते है की मानव शरीर 5 तत्व से बना हुआ है ये करीब करीब सब ही जानते है ।
🥀लेकिन एक एक तत्व की पाँच पाँच प्रकृति भी है ये हम कम ही जानते है ।

🌺हमारा शरीर तथा ब्रह्माण्ड का निर्माण एक जैसा ही हुआ है और सारा ब्रह्माण्ड हमारे अपने ही अंदर मौजूद है नादान
🍃सभी तत्व हमारे शरीर में अपने अपने स्थान पर रहते हैं और ये सब अपनी अपनी प्रकृति के साथ हमारे शरीर ही वास करते है। जैसे:-

1🌺पृथ्वी तत्व
2🌺जल तत्व
3🌺अग्नि तत्व
4🌺वायु तत्व
5🌺आकाश तत्व

👉🏻 तत्वों की प्रकर्ति के नाम 👇🏻

👉🏻पृथ्वी तत्व~ 🌺
1🍃हड्डी,
2🍃मांस,
3🍃त्वचा,
4🍃रंध्र,
5🍃नाखून

👉🏻जल तत्व~🌺
1🌿 खून
2🌿लार
3🌿पसीना
4🌿मूत्र
5🌿वीर्य

👉🏻अग्नि~🌺
1🌾भूख
2🌾प्यास,
3🌾आलस्य
4🌾निंद्रा
5🌾जंभाई

👉🏻वायु तत्व🌺
1🍃बोलना
2🍃सुनना
3🍃सिकुड़ना
4🍃फैलना
5🍃बल लगाना

👉🏻आकाश तत्व🌺
1🌿 लज्जा
2🌿भय
3🌿मोह
4🌿राग
5🌿द्वेष

👉🏻इसी के साथ साथ हमारे शारीर में 👉🏻पाँच काम इंद्रियाँ ,
👉🏻पाँच ज्ञानेंद्रियाँ भी होती है
जो इस प्रकार है 👇🏻

👉🏻काम इन्द्रियाँ🌺
1🌿पैर
2🌿गुदा
3🌿लिंग
4🌿मुंह
5🌿हाथ

👉🏻ज्ञान इन्द्रियाँ🌺
🍃आंख
🍃नाक
🍃कान
🍃मुंह
🍃त्वचा

इन सबके साथ साथ इनका भी निवास हमारी काया में होता है इनको को भी जान लीजिये जो इस प्रकार है
👇🏻

🌹मन🌹बुद्धि 🌹अहंकार 🌹चित्त
🌹और ईश्वर (अलख)

🥀इन सब का ही हमारी मानव काया में निवास रहता है।
🥀इन सबका सही ज्ञान ही हमे हमको सही दिशा दिखा सकता है नादान

🥀अलख आदेश
🥀नाथ जी की फौज करेगी मौज


🚩शिव+शक्ति





शिव+शक्ति

शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन शिवलिंग कहलाते है 


शिवलिंग का अर्थ शिव का प्रतीक
लिंग का संस्कृत में चिन्ह ,प्रतीक अर्थ होता है
शिवलिंग”’क्या है >>>>>

शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है। 
स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है।शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है।

शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है नाही शुरुवात

जैसा कि हम सभी जानते है कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं|
ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।
धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है 
तथा कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग
रह्माण्ड में दो ही चीजे है : 
***ऊर्जा और प्रदार्थ | 
हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है|

इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है |

ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है. वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है. 
शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी 
अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है

लिंग - भग से ही समस्त विश्व की उत्पत्ति है। शकंर ने काम को जलाकर सृष्टि की बुध्दि से ही मैथुन द्वारा सृष्टि की है। 
सृष्टि से पहले ज्ञान और अर्थ (दृश्य) एकमेव हो रहे थे। दृश्य शक्ति के उद्भव बिना चिदात्मा भी अपने को असत् ही मानने लगता है। 
शिव ही शक्ति और शक्ति ही शिव हैं। इस द्वैत में अद्वैत तत्व अनुस्यूत है। योनि त्रिकोण है, केन्द्र या मध्यबिन्दु लिंग है। 
इच्छा - ज्ञान - क्रिया = योनि = त्रिक 
मूलाधार आदि षटचक्र भी योनि ही है। लिंग भी सर्वत्र भिन्न - भिन्न रूप में विराजमान है। 
योनि से अतीत होकर बिन्दु अव्यक्त और लिंग अलिंग हो जाता है कोई गुण, कर्म, द्रव्य बिना योनि - लिंग के नहीं बन सकते। 
याज्ञिकों के यहां भी वेदी की स्त्री रूप में, कुण्ड की योनि रूप में उपासना होती है। आद्याशक्ति साढ़ेतीन फेरे की कुण्डलिनी रूप है। 
वह शिवतत्व को अपने साढ़ेतीन फेरे से वेष्टित किए हुए है। उसी शक्ति के संयोग से शिव अनन्त ब्रह्मांड का उत्पादनादि कार्य करते हैं। 
वही कुण्डलिनी योनि है। पृथ्वी पीठ और आकाश लिंग है।

योनि = दिव्य प्रकृति, 
लिंग = परम पुरूष बिन्दु 
देवी और नाद शिव है। समस्त पीठ अम्बामय है, लिंग चिन्मय है। संसार का मूल कारण महाचैतन्य है और लोक लिड्.गात्मक है। 
ब्रह्मांड की आकृति ही शिवलिंग है। शिव स्वयं अलिंग हैं, उनसे लिंग की उत्पत्ति होती हैं शिव लिंगी और शिवा लिंग हैं। रूद्र एक मात्र स्वामी, अतीन्द्रियार्थ ज्ञानी और हिरण्यगर्म को उत्पन्न करने वाले हैं। वे अग्नि में, जल में, औषधि एवं वनस्पतियों में रहते हैं। वे सबका निर्माता हैं। रूद्र से भिन्न दूसरा तत्व ही नहीं है।

तम को ही सबका आदि और कारण कहा गया है। उसी में वैषम्य होने से सत्व, रज का उद्भव होता है। भगवान तम के नियंता हैं, वे तामस नहीं हैं। शिव से भिन्न जो कुछ भी है, उन सबके संहारक शिव हैं।

कूटस्थ एथाणु पर ब्रहम ही शिव हैं। स्थाणु (ठँठ) लिंगरूप में व्यक्त शिव है, अपर्णा जलहरी है।

शुद्ध शिवतत्व त्रिगुणातीत है। त्रिमूर्ति के अंतर्गत शिव परम बीज, तमोगुण के नियामक हैं। 
सत्व के नियमन की अपेक्षा तम का नियमन बहुत कठिन है। 
सर्वसंहारक तम है। शिव ही तम को वश में रखते हैं। अव्यक्त तत्व लिंग है। 
माया द्वारा एक ही परब्रह्म परमात्मा से ब्रह्मांडरूप लिंग का प्रादुर्भाव होता है।

चौबीस प्रकृति - विकृति, पचीसवां पुरूष, छबीसवां ईश्वर यह सब कुछ लिंग ही है।

उसी से ब्रहमा, विष्णु, रूद्र का आविर्भाव होता है।

प्रकृति से सत्व, रज, तम इन तीन गुणों से त्रिकोण योनि बनती है।

प्रकृति में स्थित निर्विकार बोधरूप शिव तत्व ही लिंग है। इसी को विश्व - तेजस - प्राज्ञ, विराट हिरण्यगर्म - वैश्वानर, जाग्रत - स्वप्न - सुषुप्ति, वहक् - साम - यजु, परा - पश्यंति - मध्यमा आदि त्रिकोणपीठों में तुरीय, प्रणव, परा वाक् स्वरूप लिंगरूप में समझना चाहिए। ''अउम '' इस प्रणवात्मक त्रिकोण में अर्ध्दमात्रास्वरूप लिंग है।
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🚩मंदिर ---श्मशान






अलख आदेश

मंदिर ---श्मशान

एक हमारे मन को हमारे अन्तर्मन अर्थात अन्तरात्मा से जोड़ना सिखाता है 
मार्ग सुगम बनाता है शून्य(शिव)में मिलने के लिए
तो एक हमारे कर्मो की रुपरेखा निर्धारित करने के लिए और आगे का मार्ग उपलब्ध करने का कक्ष मात्र है (चेंजिंग रूम) यहाँ पर सबको रुकना ही पड़ता है
जन्म या शून्य(शिव) में विलय के मार्ग हेतु।

एक आदि है तो एक अंत
मंदिर को जानने के लिए मन के अंदर जाना पड़ेगा अन्तरात्मा से मिलन हेतु।
अंत के लिए आरम्भ आवश्यक है. 
श्मसान को यदि समझना है तो लिए खुद मृत्यु बनना पड़ेगा 
तभी विजय हमारा वरण करेगी. 
जब हम भक्ति मार्ग पर चलते है तो"सोॐ''
सामान्य से --------- खास 
मानव से --------- देव 
अंत में शव से --------शिव बन सकते है । 
यानि शिव में विलीन हो सकते है।
मोक्ष प्राप्त हो सकता है।
ये सब बात करने से नही कर्मो से निर्धारित होता है 
सागर की गहराई तो वही ही जान सकता हैं जो सागर में डुबकी लगा सकें।
जय गुरु धर्मनाथ आदेश आदेश
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🚩तीन लोक




तीन लोक

 स्वर्ग लोक (आकाशलोक)
 मर्त्युलोक (पृथ्वीलोक)
नर्कलोक (पाताललोक )

कहाँ है ये सब ?? 
कहाँ  ??

क्या आगे भी कहीं कोई लोक है? 
✖नही 
✖नही 
✖नही

यहीं है तीनों लोक हैं।
नर्क भी यहीं 
पृथ्वी भी यहीं 
स्वर्ग भी यहीं 

सब हमारी अपनी दृष्टि का भर्म है"सोॐ'' इधर दृष्टि बदली कि उधर सृष्टि बदली।

नर्कलोक------- जो आदमी विचार में जी रहा है, वह नर्क में जी रहा है।

स्वर्गलोक ------जो आदमी भाव भक्ति में जी रहा है, वह स्वर्ग में जी रहा है।

मृत्युलोक--------जो दोनों के मध्य में अटका है, वह पृथ्वी (मृत्युलोक) पर

इस पृथ्वी पर अधिक लोग नर्क में जी रहे हैं। यह मत सोचो कि नर्क कहीं पाताल में है।
 नीचे यही पृथ्वी है। 
इसलिए
-नीचे—-ऊपर का अर्थ समझो। 
-नीचे का अर्थ जमीन के नीचे नहीं है। 
-ऊपर का अर्थ आकाश में मत देखने लगो।

नीचे का अर्थ है विचार। ऊपर का अर्थ है भाव। नीचे का अर्थ है विक्षिप्तता। 
ऊपर का अर्थ है विमुक्तता। और दोनों के मध्य में पृथ्वी है।
जो लोग नर्क में जी रहे हैं वे दुख पा रहे हैं बहुत दुख पा रहे हैं 
अभी पा रहे हैं वासना क्रोध इत्यदि करो और हो गए नर्क में प्रविष्ट जलने लगी आग।
 वासना क्रोध जितना गला देता है और जितना जला देता है, और कोई क्या जलायेगा?

आकाश में नहीं है स्वर्ग! ऊपर कहते हैं इसलिए कि वह ऊपर की अवस्था है, 
हमारी चेतना की ऊपरी से ऊपरी अवस्था का नाम है। भाव भक्ति श्रेष्ठतम अवस्था है हमारे भीतर का शिव है 
 ज्यादा लोग नर्क में जी रहे हैं, 
बहुत थोड़े—से लोग पृथ्वी पर जी रहे हैं, 
और बहुत विरले लोग स्वर्ग का अनुभव कर रहे हैं। 
और सब यहीं है

हमारे सरीर में तीन त्रिलोक है
खुद निर्धारित कर यहीं तुम्हारे शून्य में सब छिपा है। तुम्हारे सहस्रार में सब छिपा है"सोॐ''
प्रकाशों का प्रकाश इसी शून्य में विराजमान है। इसमें जो डूबा, वह सिद्ध हुआ, योगेश्वर हुआ।
अलख आदेश जय गुरु धर्मनाथ आदेश आदेश आदेश 
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🚩माथे पर तिलक लगाने का क्या महत्व है





माथे पर तिलक लगाने का क्या महत्व है?….

इसके पीछे आध्यात्मिक महत्व है। दरअसल, हमारे शरीर में सात सूक्ष्म ऊर्जा केंद्र होते हैं, जो अपार शक्ति के भंडार हैं। इन्हें चक्र कहा जाता है। माथे के बीच में जहां तिलक लगाते हैं, वहां आज्ञाचक्र होता है। यह चक्र हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है, जहां शरीर की प्रमुख तीन नाडि़यां इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना आकर मिलती हैं, इसलिए इसे त्रिवेणी या संगम भी कहा जाता है। यह गुरु स्थान कहलाता है। यहीं से पूरे शरीर का संचालन होता है। यही हमारी चेतना का मुख्य स्थान भी है। इसी को मन का घर भी कहा जाता है। इसी कारण यह स्थान शरीर में सबसे ज्यादा पूजनीय है। योग में ध्यान के समय इसी स्थान पर मन को एकाग्र किया जाता है जिससे मन अमन हो जाता है। आध्यात्मिक गुरु साधक को इसी जगह तिलक करके शिष्य के अंदर आध्यात्मिक शक्ति ट्रांसफर करते हैं और इसी चक्र को जगा देते हैं।
इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए हमारे ऋषियों ने टीका, बिंदी, तिलक को इस जगह लगाने का विधान बनाया और इसे धर्म के साथ जोड़ दिया। अगर किसी के पास गुरु नहीं हैं तो वह इसे सूक्ष्मता से अनुभव नहीं कर पाएगा, लेकिन स्थूलता से भी पूरे भाव के साथ बिंदी या तिलक लगाकर अशांत मन को शांत किया जा सकता है।

इस बात को आप भी महसूस कर सकते हैं। जब मन बहुत परेशान हो या तनाव में हो, तो आंखें बंदकर इस जगह पर मन को ले आएं। मन के यहां आते ही वह शांत व एकाग्र हो जाएगा। सिर्फ टीका लगाने से मन शांत नहीं होगा, बल्कि मन को आज्ञाचक्र पर लाने से वह एकाग्र होगा। तिलक तो माध्यम है मन को आज्ञाचक्र पर लीन करने का। तिलक पर फोकस न करो, बस मन को आज्ञाचक्र में लीन करते जाओ, लीनता बढ़ती जाएगी।
बिना तिलक धारण किए कोई भी पूजा-प्रार्थना शुरू नहीं होती है। मान्यताओं के अनुसार सूने मस्तक को शुभ नहीं माना जाता। माथे पर चंदन, रोली, कुमकुम, सिंदूर या भस्म का तिलक लगाया जाता है।
अनामिका शांति दोक्ता, मध्यमायुष्यकरी भवेत्।
अंगुष्छठ:पुष्टिव:प्रोत्त, तर्जनी मोक्ष दायिनी।।
अर्थात् तिलक धारण करने में अनामिका अंगुली मानसिक शांति प्रदान करती है, मध्यमा अंगुली मनुष्य की आयु वृद्धि करती है, अंगूठा प्रभाव, ख्याति और आरोग्य प्रदान करता है, इसलिए विजयतिलकअंगूठेसे ही करने की परम्परा है। तर्जनी मोक्ष देने वाली अंगुली है। इसलिए मृतक को तर्जनी से तिलक लगाते हैं।
सामुद्रिकशास्त्र के अनुसार, अनामिका और अंगूठा तिलक करने में सदा शुभ माने गए हैं। अनामिका अंगुली सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है। इसका अर्थ यह है कि साधक सूर्य के समान दृढ, तेजस्वी, निष्ठा-प्रतिष्ठा और सम्मान वाला बने। दूसरा अंगूठा है, जो हाथ में शुक्र क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र ग्रह जीवनी शक्ति का प्रतीक है। इससे साधक के जीवन में शुक्र के समान ही नव जीवन का संचार होने की मान्यता है।
स्त्रीयों को गोल और पुरुषों को लम्बवत तिलक धारण करना चाहिए। तिलक लगाने से मन शांत रहता है। अनिष्टकारी शक्तियों से रक्षण होने के कारण और सात्विकता एवं देवत्व आकृष्ट होने के कारण हमारे चारों ओर सूक्ष्म कवच का निर्माण होता है। आजकल कुछ स्त्रीयाँ टीवी धारावाहिक देखकर विचित्र आकार के टीका लगती हैं तथा बाज़ार में उपलब्ध प्लास्टिक व विभिन्न हानिकारक रसायनो की बिंदी लगाने से भी कोई लाभ नहीं होता अपितु हानि ही होती है क्योंकि उसमे सात्विकता को आकृष्ट करने की क्षमता नहीं होती। तिलक धारण करने से प्रत्येक जीवात्मा को उसके आध्यात्मिक शास्त्रीय लाभ अवश्य मिलते है। चाहे वह हिन्दू हो या अन्य किसी भी पंथ संप्रदाय का हो।.



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🚩भगत के वश मे है भगवान




भगत के वश मे है भगवान

भक्ति शब्द की व्युत्पत्ति 'भज्' धातु से हुई है, जिसका अर्थ 'सेवा करना' या 'भजना' है, अर्थात् श्रद्धा और प्रेमपूर्वक इष्ट देवता के प्रति आसक्ति। नारदभक्तिसूत्र में भक्ति को परम प्रेमरूप और अमृतस्वरूप कहा गया है। 

जिस मानव देह को लोग बिना भक्ति के ही खत्म कर देते हैं, उन्हें इस बात का एहसास नहीं कि भगवान ने करुणा करके उन्हें यह तन दिया है। उस शरीर को पाने के बाद उसका सही अर्थों में लोग उपयोग नहीं कर रहे हैं। उसे अगर भक्ति के मार्ग पर लगाया जाए तो वह भगवान को भी वश में करके उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है।
जो स्वर्ग चाहते हैं, उन्हें पता नहीं कि वहां केवल भोग किया जा सकता है। स्वर्ग में रहने वाले भगवान भक्ति और कर्म नहीं कर सकते हैं। यह पुण्य लाभ तो मानव शरीर पाने से ही संभव है।
मानव शरीर पाने के बाद ही कर्म करके मनुष्य को भगवान से प्रेम करने का अवसर मिलता है। इसलिए भगवान की भक्ति करनी चाहिए। 84 लाख योनियों में श्रेष्ठ मानव जीवन पाने के बाद भी जो लोग स्वर्ग पाने की इच्छा रखते हैं, वे मूर्ख हैं।
कर्म इस संसार में आने वाला हर जीव करता है, मगर भगवत्‌ आराधना और भक्ति केवल मानव तन से ही संभव है। उसके बाद भी कुछ लोग अपने कर्म और भक्ति के बाद स्वर्ग पाने की इच्छा मन में पालते हैं। उन्हें पता नहीं होता है कि जिसे वे स्वर्ग पाने का रास्ता समझते हैं, उस मानव तन को पाने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं, क्योंकि मानव देह पाने के बाद ही भक्ति रस से मिलने वाले आनंद का अनुभव किया जा सकता है।

भक्ति बीज पलटै नहीं, जो जुग जाय अनन्त |
ऊँच नीच घर अवतरै, होय सन्त का सन्त ||

की हुई भक्ति के बीज निष्फल नहीं होते चाहे अनंतो युग बीत जाये | भक्तिमान जीव सन्त का सन्त ही रहता है चाहे वह ऊँच - नीच माने गये किसी भी वर्ण - जाती में जन्म ले |

भक्ति पदारथ तब मिलै, तब गुरु होय सहाय |
प्रेम प्रीति की भक्ति जो, पूरण भाग मिलाय ||

भक्तिरूपी अमोलक वस्तु तब मिलती है जब यथार्थ सतगुरु मिलें और उनका उपदेश प्राप्त हो | जो प्रेम - प्रीति से पूर्ण भक्ति है, वह पुरुषार्थरुपी पूर्ण भाग्योदय से मिलती है |

भक्ति जो सीढ़ी मुक्ति की, चढ़ै भक्त हरषाय |
और न कोई चढ़ि सकै, निज मन समझो आय ||

भक्ति मुक्ति की सीडी है, इसलिए भक्तजन खुशी - खुशी उसपर चदते हैं | आकर अपने मन में समझो, दूसरा कोई इस भक्ति सीडी पर नहीं चढ़ सकता | (सत्य की खोज ही भक्ति है)

भक्ति बिन नहिं निस्तरे, लाख करे जो कोय |
शब्द सनेही होय रहे, घर को पहुँचे सोय ||

कोई भक्ति को बिना मुक्ति नहीं पा सकता चाहे लाखो लाखो यत्न कर ले | जो गुरु के निर्णय वचनों का प्रेमी होता है, वही सत्संग द्वरा अपनी स्थिति को प्राप्त करता है |

भक्ति गेंद चौगान की, भावै कोइ लै लाय |
कहैं कबीर कुछ भेद नहिं, कहाँ रंक कहँ राय ||

भक्ति तो मैदान में गेंद के समान सार्वजनिक है, जिसे अच्छी लगे, ले जाये | गुरु कबीर जी कहते हैं कि, इसमें धनी - गरीब, ऊँच - नीच का भेदभाव नहीं है |

कबीर गुरु की भक्ति बिन, अधिक जीवन संसार |
धुँवा का सा धौरहरा, बिनसत लगै न बार ||

कबीर जी कहते हैं कि बिना गुरु भक्ति संसार में जीना धिक्कार है | यह माया तो धुएं के महल के समान है, इसके खतम होने में समय नहीं लगता |

जब लग नाता जाति का, तब लग भक्ति न होय |
नाता तोड़े गुरु बजै, भक्त कहावै सोय ||

जब तक जाति - भांति का अभिमान है तब तक कोई भक्ति नहीं कर सकता | सब अहंकार को त्याग कर गुरु की सेवा करने से गुरु - भक्त कहला सकता है |

भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहीं भाव |
भक्ति भाव एक रूप हैं, दोऊ एक सुभाव ||

भाव (प्रेम) बिना भक्ति नहीं होती, भक्ति बिना भाव (प्रेम) नहीं होते | भाव और भक्ति एक ही रूप के दो नाम हैं, क्योंकि दोनों का स्वभाव एक ही है |

जाति बरन कुल खोय के, भक्ति करै चितलाय |
कहैं कबीर सतगुरु मिलै, आवागमन नशाय ||

जाति, कुल और वर्ण का अभिमान मिटाकर एवं मन लगाकर भक्ति करे | यथार्थ सतगुरु के मिलने पर आवागमन का दुःख अवश्य मिटेगा |......."सोम"


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